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जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने पर विवाद, दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को क्यों भेजा नोटिस?

जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने पर विवाद, दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को क्यों भेजा नोटिस?


ज़िल्लर वार्ता राष्ट्रीय ,नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए लंबे समय से इस्तेमाल होने वाले जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने का मामला अब अदालत पहुंच गया है। भारतीय युवा कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति से जुड़े सवालों और प्रदर्शन स्थलों के निर्धारण की प्रक्रिया पर पुलिस से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई नवंबर में होनी है। 

क्या है पूरा मामला?

दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश के जरिए जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया। इसके स्थान पर राजधानी में तीन नए प्रदर्शन स्थल निर्धारित किए गए हैं। पुलिस के अनुसार, यह फैसला केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया।

नए निर्धारित स्थलों में मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का CBD ग्राउंड शामिल हैं। पुलिस ने यह भी कहा है कि इन स्थलों पर धरना-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अलग से जारी की जाएगी। 

जंतर-मंतर को सूची से हटाने का फैसला ऐसे समय आया है, जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित अनियमितताओं और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। विपक्षी दल और कुछ संगठन चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग और भाजपा इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं।

भारतीय युवा कांग्रेस ने अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाया?

भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब ने दिल्ली पुलिस की ओर से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दिए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।

याचिका के अनुसार, संगठन ने 25 सितंबर को पुलिस से 1 अक्टूबर से 25 अक्टूबर के बीच लगभग 100 से 150 लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी। प्रस्तावित प्रदर्शन का उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध दर्ज कराना था। संगठन ने अपनी याचिका में कहा कि वह सुरक्षा, यातायात, अनुशासन और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी वैध शर्तों का पालन करने के लिए तैयार था।

इसके बावजूद पुलिस ने 1 अक्टूबर को अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद युवा कांग्रेस ने अदालत का रुख किया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े मुद्दे उठाए। 

पुलिस ने अदालत में क्या दलील दी?

दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि जंतर-मंतर को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मद्देनजर प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया गया है।

पुलिस की ओर से यह दलील भी दी गई कि अब रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और CBD ग्राउंड को नए प्रदर्शन स्थलों के रूप में निर्धारित कर दिया गया है। इसलिए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति से संबंधित याचिका का मूल उद्देश्य अब पहले जैसा नहीं रह गया है।

सरकारी पक्ष ने यह भी बताया कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के फैसले को चुनौती देने से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। 

हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस क्यों भेजा?

दिल्ली हाईकोर्ट के सामने सवाल केवल इतना नहीं था कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं। याचिका में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने की प्रक्रिया और पुलिस के अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि जंतर-मंतर को सूची से हटाए जाने के बाद भी याचिका में उठाए गए अन्य मुद्दे महत्वपूर्ण बने हुए हैं। उन्होंने अदालत से पुलिस का पक्ष जानने का अनुरोध किया और कहा कि नए घटनाक्रम के अनुरूप याचिका में संशोधन किया जाएगा।

इसके बाद न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने संबंधित मुद्दों पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया। अदालत ने विशेष रूप से शांतिपूर्ण सभा पर स्वतः या बिना पर्याप्त व्यक्तिगत आकलन के प्रतिबंध लगाने और प्रदर्शन की अनुमति के लिए कम से कम 10 दिन पहले आवेदन करने की अनिवार्यता से जुड़े सवालों पर पुलिस का जवाब मांगा।

मामले की अगली सुनवाई नवंबर में निर्धारित की गई है। 

शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और प्रशासन की जिम्मेदारी

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, ये अधिकार पूर्णतः असीमित नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य वैध संवैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा, यातायात और आम नागरिकों की सुविधाओं का ध्यान रखे। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और उनकी मांगों को भी कानूनी प्रक्रिया के तहत महत्व दिया जाना आवश्यक है।

इसी संतुलन को लेकर जंतर-मंतर का मामला महत्वपूर्ण बन गया है। सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल निर्धारित करना शांतिपूर्ण विरोध को व्यवस्थित करने का पर्याप्त उपाय है, या फिर अनुमति देने की प्रक्रिया में प्रत्येक मामले का अलग-अलग आकलन भी जरूरी है। इस विषय पर अदालत के सामने उठाए गए सवालों का जवाब संबंधित पक्षों की दलीलों और आगे की न्यायिक प्रक्रिया से स्पष्ट होगा। 

अब आगे क्या होगा?

दिल्ली हाईकोर्ट ने फिलहाल जंतर-मंतर को दोबारा प्रदर्शन स्थल घोषित करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है। अदालत ने पुलिस से जवाब मांगते हुए मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई है। इसलिए यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति बहाल हो गई है या पुलिस के फैसले को अदालत ने अवैध घोषित कर दिया है।

आने वाली सुनवाई में पुलिस की दलीलों, प्रदर्शन की अनुमति संबंधी नियमों और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार किया जाएगा। इस मामले का परिणाम दिल्ली में भविष्य के विरोध प्रदर्शनों की अनुमति देने की प्रक्रिया और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के नियमन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

निष्कर्ष: जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का मामला अब प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर कानूनी बहस का विषय बन गया है। दिल्ली हाईकोर्ट का नोटिस पुलिस के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका में उठाए गए व्यापक सवालों पर जवाब मांगने की प्रक्रिया का हिस्सा है। अंतिम निर्णय अदालत की आगामी सुनवाई और संबंधित पक्षों की दलीलों पर निर्भर करेगा।